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Wednesday, 11 May 2016

एम.ए. पत्रकारिता में प्रवेश करने का अंतिम मौका

20 मई तक करें आवेदन
जौनपुर। वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के दो वर्षीय एम ए पत्रकारिता एवं जनसंचार पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए में 45 प्रतिशत अंकों के साथ किसी भी विषय में स्नातक डिग्रीधारक आवेदन कर सकते हैं। ऐसे विद्यार्थी जिन्होंने स्नातक अंतिम वर्ष की परीक्षा दी है तथा परिणाम नहीं आया है वह भी आवेदन कर सकते हैं। इसके लिए अंतिम तिथि 20 मई 2016 है। आवेदन के लिए विश्वविद्यालय की वेबसाइट-  http://www.vbspu.ac.in पर उपलब्ध फार्म को डाउनलोड करके सामान्य एवं पिछड़े वर्ग के विद्यार्थियों को 200 रूपए एवं एससी/एसटी विद्याथियों को 150 रुपये के बैंक ड्राफ्ट के साथ विश्वविद्यालय में जमा करना होगा। बैंक ड्राफ्ट FINANCE OFFICER, V. B. S. PURVANCHAL UNIVERSITY JAUNPUR के पक्ष में देय होगा। पाठ्यक्रम की फीस 10 हजार रूपए प्रति सेमेस्टर है। पूर्वांचल विश्वविद्यालय का दो वर्षीय एम ए जनसंचार पाठ्यक्रम चार सेमेस्टर में विभाजित है। पाठ्यक्रम में प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, वेब मीडिया, विज्ञापन, जनसम्पर्क आदि शामिल है।

Saturday, 7 May 2016

पकड़ा गया बाहरसिंघा


जौनपुर। शाहगंज कोतवाली थाना क्षेत्र के असैथा गांव में बारहसिंघा कहीं से बहक करके आ गया। इसकी जानकारी होने पर क्षेत्र में अफरा-तफरी मच गयी। देखा गया कि बारहसिंघा को कुत्ते दौड़ा रहे थे जिस पर लोगों ने कुत्तों से बचाकर उसे एक कमरे में बांध दिया है। लोगों द्वारा इसकी सूचना वन विभाग को दे दी गयी है।

पूर्वांचल में हुआ योग महोत्सव

जौनपुर। वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर के ओपन थिएटर में शनिवार की शाम को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के निर्देश पर दो दिवसीय योग महोत्सव का आयोजन हुआ. महोत्सव में पहले दिन सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ ही साथ योग के विविध आयामों पर चर्चा हुई।
मुख्य अतिथि प्रसिद्ध योगाचार्य सुरेन्द्र योगी ने दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम की शुरुआत की। उन्होंने कहा कि योग भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है। आज जनमानस योग से निरोग हो रहा है। ऐसे में हम सभी का दायित्व बनता है कि जन-जन को योग से जोड़ें। योग गुरु जय सिंह गहलोत ने प्राणायाम की शक्ति विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि प्राणायाम करने वालों का शरीर अन्दर और बाहर से शुद्ध होना चाहिए। प्राणायाम बहुत सारे रोगों से मुक्ति दिलाने में बड़ी भूमिका अदा करता है। विश्वविद्यालय के कुलसचिव डा. देवराज ने भी अपने विचार व्यक्त किये।
विशिष्ट अतिथि श्री अचल हरिमूर्ति ने योग द्वारा नशामुक्ति विषय पर अपनी बात रखी। बाल कलाकार अक्षिता पुरोहित, पीहू पाल, अपूर्वा ने समूह नृत्य प्रस्तुत किया। वैभव बिन्दुसार ने ऐ मेरे वतन के लोगो..., शौर्य पाल ने आओ बच्चों तूम्हे दिखाये गीत प्रस्तुत कर सबको भाव विभोर कर दिया। स्वागत गीत शास्वत मिश्र एवं सरस्वती वंदना शुभ्रामल द्वारा प्रस्तुत किया गया। संचालन संजय श्रीवास्तव एवं आभार डा. मनोज मिश्र ने व्यक्त किया।
अतिथि का स्वागत  डा. विक्रम देव द्वारा किया गया। इस अवसर पर डा. एच.सी. पुरोहित, डा. अविनाश पार्थिडकर, डा. दिग्विजय सिंह राठौर, डा. शैलेष प्रजापति, डा. इन्द्रेश, अशोक सिंह, रजनीश सिंह, एम.एम. भट्ट, सुशील प्रजापति, डा. विद्युत मल्ल समेत विश्वविद्यालय के शिक्षक, कर्मचारी एवं छात्र छात्राएं उपस्थित रहे।

Wednesday, 4 May 2016

सह राज्य प्रभारी बनाये जाने पर योग गुरू हरिमूर्ति का हुआ जोरदार स्वागत

  जौनपुर
। पतंजलि योग परिवार के मुखिया योग गुरू बाबा रामदेव द्वारा जौनपुर के प्रभारी अचल हरिमूर्ति को पतंजलि योग समिति उत्तर प्रदेश का सह राज्य प्रभारी बनाये जाने पर जनपद में खुशी की लहर दौड़ गयी। इस मनोनयन पर शिक्षक होने के नाते शिक्षा विभाग एवं जन-जन तक योग पहुंचाने पर योगियों द्वारा कार्यक्रम आयोजित करके श्री हरिमूर्ति का जोरदार स्वागत किया गया। लोगों ने श्री हरिमूर्ति को बधाई देते हुये बाबा रामदेव के प्रति आभार जताया। अचल जी का यह मनोनयन हरिद्वार में आयोजित राष्ट्रीय अधिवेशन में स्वयं बाबा रामदेव जी ने किया है।
  जनपद आगमन पर कलेक्टेªट स्थित योगस्थल पर साधकों ने बैण्ड-बाजों से स्वागत करते हुये माल्यार्पण किया। इस अवसर पर पत्रकार कपिलदेव मौर्य, अजय पाण्डेय, शशिभूषण यादव, प्रो. बीडी शर्मा, शम्भूनाथ योगी, सूबेदार मेजर जिले सिंह, डा. केबी यादव, महेन्द्र मौर्य, डा. धुवराज, लोकनाथ, चन्द्रशेखर, संजय श्रीवास्तव, मदन मोहन भट्ट, ममता भट्ट, अंजुम श्रीवास्तव, लाल बहादुर योगी, डा. चन्द्रसेन, राम अवधेश विश्वकर्मा, रामकृष्ण परमहंस, डा. हेमंत, राजेश कुमार, सिकन्दर, रामकुमार, संतोष, जगदीश सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।
  इसी क्रम में नखास में आयोजित एक सादे समारोह में श्री हरिमूर्ति का माल्यार्पण कर जोरदार स्वागत हुआ। इस दौरान तेजस परिवार के मुखिया रामजी जायसवाल ने श्री हरिमूर्ति की इस योग यात्रा को हर पल नित एक नयी ऊंचाई प्रदान करने के लिये कामना किया। इस अवसर पर अजय पाण्डेय, संतोष सोनी, ओपी जायसवाल, कुमार कमलेश, संजय शुक्ला, शुभांशू जायसवाल, अंकित जायसवाल, मनीष कुमार, वैभव जायसवाल, देवेन्द्र यादव, अक्षय कुमार, प्रमोद जायसवाल सहित अन्य लोग उपस्थित रहे। इसके अलावा अन्य जगहों पर समारोह का आयोजन करके लोगों ने श्री हरिमूर्ति की इस नयी जिम्मेदारी पर बधाई देते हुये उज्ज्वल भविष्य की कामना किया।

Saturday, 30 April 2016

जौनपुर गौरव : कम्प्यूटर आपरेटर से सम्पादक बने रामजी जायसवाल



जौनपुर। मेहनत, ईमानदारी और पक्के इरादे से कार्य किया जाय तो सफलता जरूर मिलती है। इन बातों को सचकर दिखाया है जौनपुर के एक युवा सम्पादक रामजी जायसवाल ने। श्री जायसवाल 6 वर्ष पूर्व तक जौनपुर से प्रकाशित एक समाचार पत्र में मात्र 15 सौ रूपये प्रति माह की नौकरी करते थे लेकिन आज वे खुद बुलंद हौंसले के बल पर 4 समाचार पत्रों के मालिक हैं। श्री जायसवाल की जिन्दगी का सफर कांटों से भरा था। इसके बाद भी उन कांटों भरे रास्ते पर चलकर उन्होंने एक मुकाम हासिल किया है। श्री जायसवाल 4 न्यूज पेपर के सम्पादक होने के अलावा पत्रकारों के हित की लड़ाई लड़ने के लिये गोमती जर्नलिस्ट एसोसिएशन का गठन किया। साथ में सम्पादक मण्डल के महामंत्री हैं। इसके अलावा स्वामी अड़गड़ानन्द जी के सेवा ट्रस्ट के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं। बता दें कि श्री जायसवाल जौनपुर नगर के नखास मोहल्ले के मूल निवासी हैं। उनका जन्म 30 जून 1977 ई. को हुआ था। उनके परिवार के आर्थिक स्थिति शुरू से ही खराब थी जिसके कारण उन्हें किशोरा अवस्था में पढ़ाई के साथ एक टाइप राइटर की दुकान पर मात्र 10 रूपये प्रतिदिन के हिसाब से नौकरी करनी पड़ी। इतने कम पैसों में घर का खर्च न चलने के कारण वे 200 रूपये प्रति माह पर अखबार भी बांटना शुरू किया। वर्ष 2000 में जौनपुर से प्रकाशित हिन्दी दैनिक समाचार पत्र ‘दैनिक मान्यवर’ में कम्प्यूटर आपरेटर के पद की नैकरी मात्र 1500 रूपये प्रतिमाह पर शुरू किया। इसके बाद इसी तनख्वाह पर जौनपुर से ही प्रकाशित हिन्दी दैनिक समाचार पत्र तरूणमित्र में 9 माह तक सेवा किया। गरीबी से संघर्ष कर रहे श्री जायसवाल के ऊपर वर्ष 2001 में वज्रपात हो गया। उनके पिता की 1 जनवरी वर्ष 2001 को अचानक आयी बीमारी के कारण निधन हो गया। पिता की मौत के बाद उन पर आर्थिक, मानसिक और शारीरिक कष्ट का वज्रपात हो गया। इस संकट की घड़ी से जुझते और गरीबी से लड़ते पूरे 11 वर्ष तक उन्होंने मात्र डेढ़ हजार रूपये की नौकरी करते रहे। नौकरी करने के साथ ही वर्ष 2007 में उन्होंने तेजस के नाम से एक समाचार एजेंसी का संचानल शुरू किया। इस संस्थान के माध्यम से करीब दो दर्जन से अधिक समाचार पत्रों में न्यूज जाने लगा। वर्ष 2009 में उन्होंने तेजस टूडे नामक एक दैनिक समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू किया जो निष्पक्ष व निर्भीक लेखनी के कारण कम समय में काफी लोकप्रिय हो गया। इस सफलता के बाद श्री जायसवाल ने तेजस नाम से ही उर्दू, सप्ताहिक व पाक्षिक समाचार पत्र का भी प्रकाशन कर दिया। पत्रकारिता के साथ श्री जायसवाल पत्रकारों की समस्याओं को देखते हुये गोमती जर्नलिस्ट एसोसिएशन नामक एक संगठन की स्थापना किया। उनकी बढ़ते संघर्ष को देखते हुये जौनपुर के सम्पादक मण्डल ने उन्हें महासचिव का दायित्व सौंप दिया। कुल मिलाकर श्री जायसवाल पत्रकार होने के साथ सामाजिक सरोकार में काफी रूचि लेते हैं। यही कारण है कि श्री लक्ष्मी पूजा महासमिति ने उन्हें महामंत्री बना दिया है। वहीं इनकी लगन व मेहनत को देखते हुये स्वामी अड़गड़ानन्द जी के परमप्रिय शिष्य श्रद्धा बाबा ने श्री जायसवाल को ट्रस्ट का राष्ट्रीय प्रवक्ता बनाया है।
http://www.shirazehind.com/2016/04/blog-post_262.html

Wednesday, 2 March 2016

तीन दिवसीय वार्षिक खेल समागम समारोह

जौनपुर। वीर बहादुर सिंह पूर्वान्चल विश्वविद्यालय के एकलव्य स्टेडियम में बुधवार को तीन दिवसीय वार्षिक खेल समागम समारोह की शुरूआत हुई। उद्घाटन समारोह में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. पीयूष रंजन अग्रवाल ने झण्डारोहण कर समागम का शुभारम्भ किया। उद्घाटन सत्र में बतौर मुख्य अतिथि उन्होंने कहा कि फील्ड में सफल होने वाला विद्यार्थी जीवन के हर क्षेत्र में सदैव सफल होता है, क्योंकि वह अनुशासन व संगठित होकर कार्य करता है। जीवन में धूप व छांव सदैव आते जाते रहते हैं इसमें समय का सही प्रबंधन करना चाहिए। सफलता के लिए निरंतर कोशिश करते रहना चाहिए। यही कोशिशें रंग लाती हैं। उन्होंने कहा कि खेल प्रतिस्पर्धाओं ने भाग लेने वाले विद्यार्थियों की पढ़ाई के समय और उसके बाद सदैव एक अलग पहचान बनती है। समय का सही प्रबंधन कर आगे बढ़ते रहना चाहिए।
 खेल समिति के अध्यक्ष प्रो. बीबी तिवारी ने कहा कि विश्वविद्यालय के खिलाडि़यों ने राष्ट्रीय स्तर पर विश्वविद्यालय का मान बढ़ाया है। यह एकलव्य स्टेडियम परिसर के विद्यार्थियों के लिए मानसिक व शारीरिक मजबूती का बड़ा केन्द्र है। तीन दिवसीय यह प्रतियोगिताएं परिसर के विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास की एक कार्यशाला है।
खेल समिति के सचिव डा. प्रदीप कुमार ने विश्वविद्यालय परिसर की खेलकूद गतिविधियों पर रिपोर्ट प्रस्तुत की। पहले दिन 1500 मीटर में पुरूष और महिला दौड़ स्पर्धा काआयोजन किया गया। पुरूष प्रतियोगिता में सूर्य प्रताप सिंह प्रथम, पुलकित सिंह द्वितीय एवं अंकित मौर्य ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। महिला वर्ग में प्रभावती पटेल ने प्रथम, अजीता ने द्वितीय एवं नेहा सिंह ने तृतीय स्थान प्राप्त किया।
स्वागत डा. एच.सी. पुरोहित एवं संचालन अशोक सिंह ने किया। इस अवसर पर प्रो. डीडी दूबे, डा. विपिन चन्द्र अस्थाना, डा. अजय प्रताप सिंह, प्रो. एके श्रीवास्तव, डा. जेबी सिंह, डा. हरेन्द्र सिंह, डा. रामआसरे शर्मा, डा. देवेन्द्र कुमार सिंह, डा. रामनारायण, डा. अविनाश पाथर्डीकर, डा. वीडी शर्मा, डा. अजय द्विवेदी, डा. वंदना राय, डा. मनोज मिश्र, डा. रजनीश भास्कर, डा. दिग्विजय सिंह राठौर, डा. अवध बिहारी सिंह, डा. सुनील कुमार, डा. अमरेन्द्र सिंह, डा. रशिकेश, डा. विवेक पाण्डेय, धर्मेन्द्र सिंह, डा. सुशील सिंह, डा. एसपी तिवारी, डा. राजेश शर्मा, रजनीश सिंह, डा. राजेश सिंह आदि उपस्थित रहे।

Friday, 12 February 2016

मोदी जी देशद्रोहियों को निपटाएं...

 सुरेश गांधी
शून्य से ५५ डिग्री नीचे ६ दिनों तक जिंदगी के लिए संघर्ष करके अमर हो गए सियाचीन के दस योद्धाओं की रुह भी आज रो रही होगी। धिक्कार है इस देश को जहां २२,५०० फीट उंचाई पर शहीद १० सैनिकों ने क्या इसीलिए शहादत कि देश की संसद हमले के दोषी आतंकी अफजल गुरु की बरसी मनाई जाय। पाकिस्तान जिन्दाबाद, हाफिज सईद जिंदाबाद समेत देश विरोधी कई नारे लगाए जाय। खासकर वहां, जिसे देश के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त है। जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) बुद्धिजीवियों का गढ़ कहा जाता रहा है। ऐसे शिक्षण संस्थान में कुछ छात्रों की सोच पूरी तरह देशद्रोही है। ऐसे में सवाल यही है जनता की कमाई से कब तक पलेंगे देशद्रोही? कब तक इन देशद्रोहियों को हमारा देश सहेगा? प्रेस क्लब में भारत विरोधी नारों की जिम्मेदारी किसकी है? क्या इसके लिए प्रशासन जिम्मेदारी नहीं?
जेएनयू हो या प्रेस क्लब, जब देश के खिलाफ देशद्रोहियों व आतंकवादियों द्वारा नारेबाजी की जायेगी, कार्रवाई होगी और होनी भी चाहिए। लेकिन दुख है कि जेएनयू में वह सब कुछ हुआ जो नहीं चाहिए। जिस देश की सुरक्षा के लिए हमारे जवान प्राणों की चिंता किए बगैर सीमा पर तैनात है, दुश्मनों की गोलियों से शहीद होते है। ऐसे जवान हनुमंतथप्पा जिंदगी और मौत से जब जूझ रहे थे, तब शिक्षा के मंदिर जेएनयू कैम्पस में भारत विरोधी नारे लगाएं जा रहे थे। संसद हमले का आरोपी अफजल गुरु की बरसी मनाई जा रही थी। कितने अफजल मारोगे, घर-घर पैदा होंगे अफजल व देश की बर्बादी होने तक जारी रखेंगे आंदोलन जैसे नारे गूंज रहे थे और जब पुलिस हरकत में आई और मामले में छात्रसंघ अध्यक्ष कंहैया को गिरफ्तार किया तो इस कार्रवाई को भी विपक्ष सियासी चश्मे से देखने लगा। भारत विरोधी नारे लगाने वालों की हिमाकत करती नजर आ रही है। पुलिस पर आरोप लगाएं जाने लगे कि यह कार्रवाई सत्ता के पक्ष के दवाब में किया गया है। जबकि सच तो यह है कि भारत विरोधी इस नारे से हर भारती का खून खौल रहा है। तो फिर सवाल यही है क्या तिरंगे पर सियासत भारी है?
बेशक, हाल के दिनों में चाहे वह सम्मान लौटाने का प्रकरण रहा हो या मुठभेड़ में मारी गयी इसरतजहां को भारत की बेटी बताने का वाकया। इन सोचों व विचारधाराओं से तो यही लगता है जैसे भारत में देशद्रोही सोच की धारा बह रही है। बुद्धिजीवियों का गढ़ कहा जाने वाला जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) जैसे शिक्षण संस्थान में कुछ छात्रों की सोच न सिर्फ देशद्रोही है, बल्कि धारा प्रवाह तरीके से देश विरोधी नारेबाजी हो रही है। ऐसा लगता है कि देशद्रोही सोच से ग्रस्त लोगों के मन में कानून की धाराओं का खौफ ही नहीं है। जबकि देशद्रोहियों के खिलाफ फांसी तक की सजा का प्रावधान है। बावजूद इसके देश की हवाओं में नफरत का जहर घोलने वाले लोग खुलेआम अपनी देशद्रोही सोच को इजहार कर रहे है। दरअसल ऐसे देशद्रोही लोगों को हमारे देश की राजनीति ने पाला-पोशा है। लेकिन अब वह वक्त आ गया है जब हमारे राजनीतिक सिस्टम को ये सोचना होगा कि वोट बैैंक हित बड़ा है या फिर देशहित बड़ा है। शायद यही वजह है कि हिन्द नायक हनुमंतथप्पा की आत्मा सांस लेने से इसलिए इंकार कर दिया कि यहां के हवाओं में के भारत विरोधी नारे तैर रहे है। यह कितनी दुखद बात है कि जहां देश के लिए शहीद होने वाले बहादुर सैनिकों पर गर्व होना चाहिए वहां देश विरोधी नारे लगाएं जा रहे है। बर्फ से जंग करने वाले हिन्दनायक हनुमंतथप्पा जैसे शहीद जवानों का मजाक उड़ाया गया। ऐसे सवाल यही है कि मोदी जी आतंकवादियों को नेस्तनाबूद करने के लिए आपने तो देश की सीमाओं से लेकर सात समुंदर पार तक जाल बिछा दिया है, लेकिन अपने ही देश में पल-बढ़ रहे आतंकियों से कैसे निपटोंगे, खासकर उस देश में जहां आतंकी नूसरत को भारत की बेटी बताने वालों की कमी नहीं है और अफसल गुरु को शहीद। मतलब साफ है मोदी जी पहले देश में पल-बढ़ रहे देशद्रोहियों को निपटाओं, जो आतंकियों के एक ईशारे पर कुछ भी करने को आमादा है। अगर इन द्रेशद्रोहियों को आने निपटा दिया तो आतंकी तो खुद-ब-खुद निपट जायेंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि परवेज मुसर्फ खुद कहा है भारत को निपटाने के लिए उसे कुछ कार्रवाई करने की जरुरत नहीं, भारत में सिर्फ एक फोन करने की जरुरत है।
२००४ में इंटेलिजेंस ब्यूरों का इनपुट था कि इसरतजहां एक आतंकवादी है। १५ जून २००४ को अहमदाबाद गुजरात में पुलिस एंकाउंटर के बाद में पहली बार सितम्बर २००९ में एनकाउंटर को फर्जी करार दे दिया। लेकिन आज जब हेडली ने साफ कर दिया है कि वह आतंकी थी। बावजूद इसके विपक्ष इसे भारत की बेटी कहने से बाज नहीं आई। एनसीपी नेता लाख रुपये का चेक भी दें आएं। गवाही में हेडली ने मुंबई हमले की पूरी साजिश बयां कर पाकिस्तान को फिर से बेनकाब किया, तो यह बता कर भारत का राजनीतिक तापमान भी बढ़ा दिया कि अहमदाबाद में वर्ष २००४ में पुलिस मुठभेड़ में मारी गयी मुंबई की कॉलेज छात्रा इशरत जहां असल में लश्कर-ए-तैयबा की सहयोगी थी। इशरत का एनकाउंटर फर्जी था या सही, यह कोर्ट को तय करना है, लेकिन देश की राजनीति १२ साल से इशरत जहां को एक राजनीतिक मोहरे के रूप में इस्तेमाल करती रही है। इसी कड़ी में हेडली के खुलासे के बाद राजनीतिक बयानबाजियों का सिलसिला फिर से शुरू हो गया है। हेडली के बयान को आधार बना कर भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने निशाना साधा है कि ‘इशरत को बेटी बताने वाले अब कहां गये?’ दरअसल, मानवाधिकारों की बहाली के लिए सक्रिय संगठनों ने इशरत की मौत पर सवाल उठाते हुए पुलिस मुठभेड़ को फर्जी बताया था और तब के राजनीतिक शोर-गुल में कांग्रेस सहित कुछ पार्टियों ने कमोबेश यही लाइन ली थी। हालांकि, इशरत की मौत से जुड़ा पूरा मामला कितना पेचीदा था, इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि इसमें सीबीआई और आइबी की जांच अलग-अलग निष्कर्षाें पर पहुंची।
कहना गलत नहीं होगा कि अपने वोट बैैंक को तुष्ट करने के मकसद से कुछ दलों की ओर से समय-समय पर की जाने वाली तुच्छ राजनीति ने देश में दक्षिणपंथी ताकतों को फलने-फूलने के लिए खाद-पानी भी मुहैया कराया है और वह लगातार मजबूत हुई हैं। इस माहौल के बरक्स कुछ दशक पीछे के राजनीतिक परिदृश्य को याद करें जेपी, लोहिया और आचार्य नरेंद्रदेव जैसे कई नाम जेहन में उभरते हैं, जिन्होंने विपक्ष में रह कर भी देश हित को अपने दलगत हितों से हमेशा ऊपर रखा है। यदि हेडली सही है, तो यह कांग्रेस सहित तमाम राजनीतिक दलों और उनके बयानवीरों के लिए सबक है कि देश की एकता-अखंडता से जुड़ने वाले संवेदनशील मुद्दों पर ठोस सबूतों के बिना अधपकी बातें कहने से बचें। ऐसे मुद्दों पर सिर्फ दलगत हितों को ध्यान में रख कर राजनीतिक रोटियां सेंकने से राष्ट्रहित को हानि पहुंचना तय है। पिछले ही दिनो हैदराबाद की एक तथाकथित यूनिवर्सिटी में जब एक छात्र ने खुदकुशी कर ली थी तो उस समय भी यही राजनीतिक दल और उनके नेता अपनी गुस्से का इजहार करने के लिये उस दलित छात्र की मौत पर घड़ियाली आंसू बहाते हुए न सिर्फ मौजूदा सरकार को घेरने की कोशिश की बल्कि भूख हड़ताल की नौटंकी तक की। सवाल यह है कि जेएनयू जैसे देशद्रोही संगठन बिना सरकारी संरक्षण के तो चल नही सकते। पिछले ६० सालों मे जो हो रहा था, उसके बारे मे कुछ भी और लिखना सूरज को दिया दिखाने जैसा ही है। जो लोग पिछले ६० सालों से सत्ता के केन्द्र मे थे, और जिनकी सर परस्ती मे यह संस्थान चल रहा था, उसकी छानबीन क्यों नहीं करा सके। यूनिवर्सिटी प्रशासन और वहां पढ़ाने वाले अध्यापकों ने अगर इन देशद्रोही गतिविधियों का समय रहते विरोध किया होता तो आज हालात कुछ बेहतर हो सकते थे लेकिन ऐसा नहीं किया गया। जानबूझकर पिछली सरकारों ने ऐसे लोगों की भरती की थी, जो चुपचाप रहकर देशद्रोह की इस खेती की सिंचाई करते रहे और समय समय पर हमारे नेता सेकुलरिज्म की आड मे उस देशद्रोह की फसल को काट काट कर सत्ता का सुख भोगते रहें।
सीबीआई ने २०१३ की अपनी चार्जशीट में इशरत को बेगुनाह मानते हुए उसे मुंबई के कॉलेज की छात्रा माना, तो आइबी ने सवाल उठाया कि मुंबई की कॉलेज छात्रा हथियारों के साथ अहमदाबाद क्यों पहुंची? तब की यूपीए सरकार भी इस मामले पर एकमत नहीं थी। तत्कालीन गृह मंत्री पी चिंदबरम ने इशरत मामले को फर्जी मुठभेड़ से नहीं जोड़ा और आगे जांच की बात कही, लेकिन कांग्रेस के ही कुछ बयानवीर नेताओं को उनकी बात पर यकीन नहीं था। ऐसे में हेडली के ताजा खुलासे से कांग्रेस निश्चित ही पसोपेश में है। हालांकि, देश की हालिया दशकों की राजनीति पर गौर करें, तो इशरत जहां प्रकरण कोई पहला मामला नहीं है, जब कांग्रेस सहित कुछ दलों के वरिष्ठ नेताओं ने ठोस सबूतों के बिना गैरजिम्मेदाराना बयानबाजी की। वह चाहे कंधार में आतंकियों को छोड़े जाने का मामला हो या बाटला हाउस प्रकरण, वह चाहे कोर्ट के आदेश पर अफजल गुरु को फांसी देने का मामला हो या फिर ओसामा बिन लादेन से जुड़े बयान। हाल के दशकों में ऐसे अनेक मौके आये हैं, जब कुछ वरिष्ठ राजनेता अपने राजनीतिक हितों को सर्वाेपरि मान कर, सिर्फ वोट बैैंक को तुष्ट करने के मकसद से आधारहीन बयानबाजी करते दिखे हैं। ऐसी तुच्छ राजनीतिक बयानबाजियों और आरोप-प्रत्यारोपों के कारण आतंकवाद जैसे अत्यंत गंभीर मसले पर भी देश कई बार दो हिस्सों में बंटा दिखता है। ऐसी स्थिति राष्ट्रीय एकता, अखंडता और लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए निश्चित रूप से खतरनाक है। इससे सामाजिक सौहार्द और अमन-चैन के वातावरण पर खतरा पैदा होता है, तो हिंसक और उग्रवादी गतिविधियों को पनपने का मौका मिलता है। वोट बैंक के इर्द-गिर्द घूमती ऐसी राजनीति ने देश में कई गंभीर समस्याओं को बढ़ाया है, तो पड़ोसी मुल्क अपनी नापाक करतूतों के लिए ऐसे माहौल का फायदा उठाने की फिराक में रहता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैैं)