शुभांशू जायसवाल
वैश्विक परिवर्तन के बीच में जहां पूंजीवादी व्यवस्था के कारण व्यवसाइयों में एक-दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ लगी रहती है, वहीं सामाजिक व्यवस्था एवं अपराध से जुड़ी खबरों के लिये संघर्ष करता पत्रकार बमुश्किल अपने परिवार के लिये दो वक्त की रोटी जुटा पाता है। ऐसा नहीं है कि पत्रकारिता निर्धनों का कार्य है। समाचार पत्र के मालिक एवं सम्पादक विज्ञापनों एवं पेड न्यूज के माध्यम से दिन-रात तरक्की कर रहे हैं लेकिन ग्रामीण अंचलों और निचले स्तर का पत्रकार जो समाचार संग्रह से लेकर करोड़ों रूपये के विज्ञापनों का प्रमुख सूत्रधार होता है, के झोली में बड़ी मुश्किल से दो रोटी आ पाते हैं।
जेठ की तपती दोपहरी हो या पूस की कपकपा देने वाली रात हो, ये पत्रकार अपने कलम और कैमरे के साथ समाज में घट रही छोटी सी छोटी और बड़ी सी बड़ी खबरों को अखबार के माध्यम से आम जनमानस में पहुंचाते रहते हैं।
बड़े दुख के साथ आज हम सबको यह सोचना पडे़गा कि भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुका प्रशासनिक अमला या वोटों की खरीददारी से लेकर नेताओं की खरीद-फरोख्त तक करने वाला राजतंत्र इन पत्रकारों की निष्ठा एवं कर्मठता पर समय-समय पर चोट पहुंचाता रहा है। चाहे वे विनायक सेन जैसा पत्रकार जिनको निष्पक्ष पत्रकारिता के कारण 8 साल जेल में रहना पड़ा या जगेन्द्र सिंह जैसा पत्रकार जिन्हें जिंदा जला दिया गया। पत्रकारों पर हमला कोई नई बात नहीं है। आये दिन इस तरह की घटनाएं होती रहती हैं।
हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर हम सभी को मिलकर इन संवाद सूत्रों एवं पत्रकारों के हित के लिये एकजुट होने के साथ-साथ इनके लिये संवेदनशील भी होना पड़ेगा, ताकि समाज में निर्भीक होकर यह पत्रकार लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की रक्षा कर सकें।


No comments:
Post a Comment